ग प्रभु को बादल और स्वयं को मोर बताने में कवि का कौन सा भाव निहित है? - ga prabhu ko baadal aur svayan ko mor bataane mein kavi ka kaun sa bhaav nihit hai?

रैदास

पद

अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा॥

इस पद में कवि ने उस अवस्था का वर्णन किया है जब भक्त पर भक्ति का रंग पूरी तरह से चढ़ जाता है। एक बार जब भगवान की भक्ति का रंग भक्त पर चढ़ जाता है तो वह फिर कभी नहीं छूटता। कवि का कहना है कि यदि भगवान चंदन हैं तो भक्त पानी है। जैसे चंदन की सुगंध पानी के बूँद-बूँद में समा जाती है वैसे ही प्रभु की भक्ति भक्त के अंग-अंग में समा जाती है। यदि भगवान बादल हैं तो भक्त किसी मोर के समान है जो बादल को देखते ही नाचने लगता है। यदि भगवान चाँद हैं तो भक्त उस चकोर पक्षी की तरह है जो अपलक चाँद को निहारता रहता है। यदि भगवान दीपक हैं तो भक्त उसकी बाती की तरह है जो दिन रात रोशनी देती रहती है। यदि भगवान मोती हैं तो भक्त धागे के समान है जिसमें मोतियाँ पिरोई जाती हैं। उसका असर ऐसा होता है जैसे सोने में सुहागा डाला गया हो अर्थात उसकी सुंदरता और भी निखर जाती है।


Chapter List

धूल दुख का अधिकार एवरेस्ट: मेरी शिखर यात्रा तुम कब जाओगे अतिथि सी वी रामन कीचड़ का काव्य धर्म की आड़ शुक्रतारे के समान रैदास रहीम आदमीनामा एक फूल की चाह गीत अगीत अग्निपथ नये इलाके में खुशबू रचते हैं हाथ क्षितिज कृतिका संचयन

ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै।
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै।।
जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढ़रै।
नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै॥
नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै।
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै॥

इस पद में कवि भगवान की महिमा का बखान कर रहे हैं। भगवान गरीबों का उद्धार करने वाले हैं उनके माथे पर छत्र शोभा दे रहा है। भगवान में इतनी शक्ति है कि वे कुछ भी कर सकते हैं और उनके बिना कुछ भी संभव नहीं है। भगवान के छूने से अछूत मनुष्य का भी कल्याण हो जाता है। भगवान अपने प्रताप से किसी नीच को भी ऊँचा बना सकते हैं। जिस भगवान ने नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना और सैनु जैसे संतों का उद्धार किया था वही बाकी लोगों का भी उद्धार करेंगे।


NCERT Solution

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

Question 1: पहले पद में भगवान और भक्त की जिन-जिन चीजों से तुलना की गई है, उनका उल्लेख कीजिए।

उत्तर: बादल-मोर, चाँद-चकोर, मोती-धागा, दीपक-बाती और सोना-सुहागा

Question 2: पहले पद की प्रत्येक पंक्ति के अंत में तुकांत शब्दों के प्रयोग से नाद-सौंदर्य आ गया है, जैसे: पानी, समानी, आदि। इस पद में अन्य तुकांत शब्द छाँटकर लिखिए।

उत्तर: मोरा-चकोरा, बाती-राती, धागा-सुहागा, दासा-रैदासा

Question 3: पहले पद में कुछ शब्द अर्थ की दृष्टि से परस्पर संबद्ध हैं। ऐसे शब्दों को छाँटकर लिखिए: उदाहरण: दीपक – बाती

उत्तर: चंदन-पानी, घन-बनमोरा, चंद-चकोरा, सोनहि-सुहागा

Question 4: दूसरे पद में कवि ने ‘गरीब निवाजु’ किसे कहा है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: दूसरे पद में भगवान को ‘गरीब निवाजु’ कहा गया है क्योंकि भगवान गरीबों का उद्धार करते हैं।

Question 5: दूसरे पद की ‘जाकी छोती जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढ़रै” इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: जिसकी छूत पूरी दुनिया को लगती है उसपर भगवान ही द्रवित हो जाते हैं। अछूत से अभी भी बहुत से लोग बच कर चलते हैं और अपना धर्म भ्रष्ट हो जाने से डरते हैं। अछूत की स्थिति समाज में दयनीय है। ऐसे लोगों का उद्धार भगवान ही करते हैं।

Question 6: रैदास ने अपने स्वामी को किन किन नामों से पुकारा है?

उत्तर: गुसईआ (गोसाई), गरीब निवाजु (गरीबों का उद्धार करने वाले)

Question 7: निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित रूप लिखिए: मोरा, चंद, बाती, जोति, बरै, राती, छत्रु, छोति, तुहीं, गुसईआ।

उत्तर: मोर, चाँद, बत्ती, ज्योति, जलना, रात, छाता, छूने, तुम्हीं, गोसाई

नीचे लिखी पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए:

Question 1: जाकी अँग-अँग बास समानी।

उत्तर: भगवान उस चंदन के समान हैं जिसकी सुगंध अंग-अंग में समा जाए।

Question 2: जैसे चितवन चंद चकोरा।

उत्तर: जैसे चकोर हमेशा चांद को देखता रहता है वैसे ही मैं भी तुम्हें देखते रहना चाहता हूँ।

Question 3: जाकी जोति बरै दिन राती।

उत्तर: भगवान यदि एक दीपक हैं तो भक्त उस बाती की तरह है जो प्रकाश देने के लिए दिन रात जलती रहती है।

Question 4: ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै।

उत्तर: भगवान इतने महान हैं कि वह कुछ भी कर सकते हैं। भगवान के बिना कोई भी व्यक्ति कुछ भी नहीं कर सकता।

Question 5: नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै।

उत्तर: भगवान यदि चाहें तो निचली जाति में जन्म लेने वाले व्यक्ति को भी ऊँची श्रेणी दे सकते हैं।


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कवि ने अपने प्रभु को बादल और स्वयं को मोर क्यों कहा है?

कवि ने ऐसा इसलिए कहा है, क्योंकि जिस प्रकार वन में रहने वाला मोर आसमान में घिरे बादलों को देख प्रसन्न हो जाता है, उसी प्रकार कवि भी अपने आराध्य को देखकर प्रसन्न होता है।

प्रभु को बादल और स्वयं को मोर बताने में कवि का कौन सा भाव निहित है?

उत्तर: कवि का स्वयं को मोर और ईश्वर को बादल बताने में दास्य भाव निहित है।

प्रभुजी बादल है तो कवि क्या है?

Answer: प्रभुजी बादल हे तो कवि मोर है। Explanation: इस पद में कवि ने उस अवस्था का वर्णन किया है जब भक्त पर भक्ति का रंग पूरी तरह से चढ़ जाता है।

प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा पंक्ति का क्या अर्थ है?

कवि का कहना है कि यदि भगवान चंदन हैं तो भक्त पानी है। जैसे चंदन की सुगंध पानी के बूँद-बूँद में समा जाती है वैसे ही प्रभु की भक्ति भक्त के अंग-अंग में समा जाती है। यदि भगवान बादल हैं तो भक्त किसी मोर के समान है जो बादल को देखते ही नाचने लगता है।